भाँति-भाँति का परिवर्तन है ,
सबके आचार विचार में ।
अक्सर वह ही धोखा खाते ,
जो पड़ते अंधे प्यार में ।
लोक लुभावनी बहुत सी चीजें ,
मिलती इस संसार में ।
छूट सभी से जाती हैं ये ,
आपस की तकरार में ।
प्रेम नही है दिखता अब तो,
घर बाहर या परिवार में ।
लूट मची है जगह-जगह ,
आती-जाती सरकार में ।
प्यार शब्द का अलग ही मतलब ,
इस सोहरत के बाजार में ।
प्रीति नही विश्वास नही ,
इस युग के झूठे प्यार में ।
भाव रहा न रही भावना ,
इस मंहगाई की मार में ।
निर्धन पर हो रहा जुल्म ,
धन दौलत के अहंकार में ।
बेईमानी और गुंडागर्दी ,
दिखती हर व्यापार में ।
एक आदमी होगा सज्जन ,
जब ढूँढोगे दो चार में ।
ईश्वर ने भी गजब रचा है ,
खेल यहाँ संसार में ।
किसी के तन पर धोती तक न,
कोई चले है ए०सी कार में ।
हाथ काँपते मानो जैसे ,
करने को किसी उपकार में ।
आस्था नही कर्म में खुद के ,
विश्वास करे चमत्कार में ।
बिना छल-कपट जियो जिंदगी ,
क्या रखा जीत या हार में ।
है अन्त एक सा हर प्राणी का ,
इस जीवन के उद्धार में ।
अहम, द्वेष, छल, कपट,
शत्रुता ,भोग करो आहार में ।
सत्कर्म करो इस जीवन में ,
सब याद करें संसार में ।
बस यही है इस संसार में ।।
बस यही है इस संसार में ।।
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