Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Tuesday, 21 April 2015

:::::::है क्या इस संसार में ::::::

भाँति-भाँति का परिवर्तन है ,
सबके  आचार  विचार  में ।
अक्सर वह ही धोखा खाते ,
जो  पड़ते  अंधे  प्यार  में ।

लोक लुभावनी बहुत सी चीजें ,
मिलती  इस  संसार  में ।
छूट  सभी  से  जाती  हैं  ये ,
आपस  की  तकरार  में ।

प्रेम  नही है दिखता अब  तो,
घर  बाहर  या  परिवार  में  ।
लूट  मची  है जगह-जगह ,
आती-जाती  सरकार  में ।

प्यार शब्द का अलग ही मतलब ,
इस सोहरत  के  बाजार  में ।
प्रीति   नही   विश्वास  नही ,
इस  युग  के  झूठे  प्यार  में ।

भाव रहा न  रही  भावना ,
इस  मंहगाई  की  मार  में ।
निर्धन  पर  हो  रहा  जुल्म ,
धन दौलत के अहंकार में ।

बेईमानी  और  गुंडागर्दी ,
दिखती हर व्यापार में ।
एक आदमी होगा सज्जन ,
जब  ढूँढोगे  दो  चार  में ।

ईश्वर ने भी गजब रचा है ,
खेल  यहाँ  संसार  में ।
किसी के तन पर धोती तक न,
कोई चले है  ए०सी  कार में ।

हाथ  काँपते  मानो  जैसे ,
करने को किसी उपकार में ।
आस्था नही कर्म में खुद के ,
विश्वास करे चमत्कार में ।

बिना छल-कपट जियो जिंदगी ,
क्या रखा जीत या  हार  में ।
है अन्त एक सा हर प्राणी का ,
इस  जीवन  के  उद्धार  में ।

अहम, द्वेष, छल, कपट,
शत्रुता ,भोग करो आहार में ।
सत्कर्म करो इस जीवन में ,
सब  याद  करें  संसार में ।

बस यही है इस संसार में ।।
बस यही है इस संसार में ।।

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