जिसकी महिमा से है जगमग ,
घर आंगन और दुनिया सारी ।
दुनिया का हर शख्स उसी से ,
वह हर कुल की रखवारी ।
सीमाओं का बन्धन उस पर ,
हर एक प्राणी से भारी ।
हे मर्म ह्रदय, कोमल काया ,
ये जग तेरा आभारी ।
जीवन को देने वाली वह ,
सुन्दर पुष्पों सी फुलवारी ।
जन्म दिया मां ने हमको ,
ममता की मूरत है प्यारी ।
भगिनी बन कर भाई के लिये ,
की दुख - सुख में हिस्सेदारी ।
पति को परमेश्वर मान लिया ,
ली घर की सब जिम्मेदारी ।
इस एक अकेले जीवन में ,
कितना कुछ सहती है नारी ।
कोरा कागज मिली कलम ,
तो लिख दी करुणा सारी ।
लगता है मानव ने अब ,
दानव से कर ली है यारी ।
गत वर्षों से अपराधों की ,
संख्या क्यों हो गई है भारी ।
क्यों नही सुरक्षित रहती है ,
महिला या कन्या कोई कुमारी ।
करली है हमने ही खुद से ,
भू विनाश की तैयारी ।
हर रोज कहीं पर बेकसूर ,
जाती बेदर्दी से मारी ।
कर रहे भ्रूण मे हत्या उसकी ,
जो न देख सकी दुनियादारी ।
शोषण नारी का करने वालों ,
क्यों ईमान से करते गद्दारी ।
कष्ट दिया जिसने भी इसको ,
इतिहास में मिट गई पुश्ते सारी ।
संघर्ष भरे इस जीवन में ,
जो खुद से कभी न हारी ।
सत् बार नमन उसको मेरा ,
है धन्य ! धन्य ! वह नारी ।
है धन्य ! धन्य ! वह नारी ।
है धन्य ! धन्य ! हर नारी ।
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