Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Wednesday, 29 April 2015

..... संघर्षशील नारी .....

जिसकी महिमा से है जगमग ,
घर आंगन और दुनिया सारी ।
दुनिया का हर शख्स उसी से ,
वह  हर  कुल  की  रखवारी ।

सीमाओं का बन्धन उस पर ,
हर  एक  प्राणी  से  भारी ।
हे मर्म ह्रदय, कोमल काया ,
ये  जग  तेरा  आभारी ।

जीवन को देने वाली वह ,
सुन्दर पुष्पों सी फुलवारी ।
जन्म दिया मां ने हमको ,
ममता की मूरत है प्यारी ।

भगिनी बन कर भाई के लिये ,
की दुख - सुख में हिस्सेदारी ।
पति को परमेश्वर मान लिया ,
ली  घर  की  सब  जिम्मेदारी ।

इस एक अकेले जीवन में ,
कितना कुछ सहती है नारी ।
कोरा कागज मिली कलम ,
तो लिख  दी  करुणा  सारी ।

लगता  है  मानव  ने  अब ,
दानव से कर ली है यारी ।
गत वर्षों से अपराधों की ,
संख्या क्यों हो गई है भारी ।

क्यों  नही  सुरक्षित  रहती  है ,
महिला या कन्या कोई कुमारी ।
करली  है  हमने  ही  खुद  से ,
भू  विनाश  की  तैयारी ।

हर रोज कहीं पर बेकसूर ,
जाती  बेदर्दी  से  मारी ।
कर रहे भ्रूण मे हत्या उसकी ,
जो न देख सकी दुनियादारी ।

शोषण नारी का करने वालों ,
क्यों ईमान से करते गद्दारी ।
कष्ट दिया जिसने भी इसको ,
इतिहास में मिट गई पुश्ते सारी ।

संघर्ष  भरे  इस  जीवन  में ,
जो  खुद  से  कभी  न  हारी ।
सत् बार नमन उसको मेरा ,
है  धन्य ! धन्य ! वह  नारी ।

है  धन्य ! धन्य ! वह  नारी ।
है  धन्य ! धन्य ! हर  नारी ।
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