Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Friday, 20 January 2017

यही है 'सच'

नहीं परवाह करता हूं कि दुनिया क्या कहेगी गर,
किसी का घर बनाने में, खुद की ईंटें बिखर जाये।
चार दीवार पर वो छत भी छाया दे नही सकती,
कि जिसकी नींव का पत्थर, किसी से लूट कर लाये।

चमक एक दौर की अक्सर सुपुर्द ए खाक हो जाये।
जो लकड़ी में लगे दीमक, तो चटकर साफ कर जाये।
नजदीकी रख सभी से दूरियां जायज नही होती,
न जाने कौन दर्द ए जिगर पर, मरहम लगा जाये।

अकड़ जकड़े जहन में तो, पकड़ सब टूट ही जाये। 
आसमानों की ख्वाहिश में,  जमीं से छूट ही जाये।
वक्त रहते कोई दूजा सहारा ढूंढ कर रख लें,
न जाने कौन सी आंधी से, दिया पल में बुझ जाये।





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