Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Wednesday, 18 October 2017

न जले 'दीया' तो जले है 'जिया' - कुम्हार की आत्मकथा


इस सोंधी देश की मिट्टी का दीया हम बनाते हैं।
गांव गलियों से शहरों तक दुकानों को सजाते हैं।

शहर 'बल्बों' की चमक से घर को  रंगीन रौशन कर
हमारी सारी  मेहनत पर वो पानी फेर जाते हैं।

हमारे घर के आंगन में दिया एक हर रोज जलता है।
उसी के आसरे परिवार का हर शख्स पलता है।

तुम दिवाली में दीये लेना तो हम भी कुछ कमा लेंगे।
तुम जो ज्यादा मनाओगे तो हम भी कुछ मना लेंगे।

मुझे भी तुम करो शामिल कि हम भी कुछ घड़ी हंस ले।
कुछ एक आहुति देकर इस हवन में हम हवन कर लें।
हमारे दिल में भी कुछ ख्वाहिशें हैं जो अधूरी हैं।
इजाजत हो तो घर अपने उजाला हम भी कुछ कर लें।

समस्त देशवासियों को दीपावली एवं गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं। 

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवाली का उत्सव देश के कोने - कोने, 
गांव शहर के हर एक घर में धूम धाम से मनाया जाये।


                                                                         

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