Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Thursday, 30 April 2015

.. धरती की अंगड़ाई (भूकंप)..

अरे  ! ! ! ! ! ये क्या था  .....

तुम्हे अहसास हुआ , हाँ लगा जैसे हलचल सी हुई ।
सहसा  शरीर  कांपने  लगा, धड़कने  थम  सी  गई ।

भागो घर से बाहर निकलो, का कोहराम छा गया ।
हर शख्स डर गया , जब भूचाल सा आ गया ।

शांत , स्थिर वस्तुएं , स्वतः ही  डगमगा  गई ।
नेपाल की गोद उजड़ी , लहर यूपी तक आ गई ।

हाल ए नेपाल ही जब, बद  से  बुरा  हो  गया ।
हंसता खेलता परिवार, अपनों से जुदा हो गया ।

शानदार , ऊंची इमारतें, खण्डहर में बदल गई ।
हजारों के सीने पर , बिन बन्दूक गोली चल गई ।

कहीं दफ्तर में रखी कुर्सियों ने, झूला था झुलाया ।
कहीं डर के घर का हर सदस्य, सड़कों पर उतर आया ।

ऐ मनचली धरती ,तू अंगड़ाई लेगी ,
यह खबर पहले ही,उन मासूमों को मिल जाती ।
तो शायद अगली सुबह, उनके जीवन में भी आती ।

ये मानव ने की थी गुदगुदी, जो धरती मुस्कुराई ।
गुनाह किसी और का, सजा तो  सबने  पाई ।

इतने ही झटके काफी थे, या कुछ और भी अवशेष है ।
क्या ये भू वासियों के लिये, भावी प्रलय का संकेत है ।

आसान नही है इस घटना के, अंजाम से उबर पाना ।
हे! धरती  मां  इस  प्रलय  को,  फिर  से  न  दोहराना ।

1 comment:

Unknown said...

what a great reality in this poem .. very nice way of writing poems..