मौसम अंगड़ाई लेता है,
जब ठंड शुरू हो जाती है।
हर घर में इस ठंडक को मिटाने,
कम्बल और रजाई आती है।
क्या होगा ऐसी सर्दी में,
बूढों को चिंता होती है।
नाजुक अंगों वाली गुडिया,
माँ के आंचल में सोती है।
ठंड न लग जाये लालन को,
हर मां की ममता कहती है।
दे उसे सलोने और रजाई ,
खुद गूदड़ में सो लेती है।
दादी कहती हैं बच्चों से,
इस ऋतु में दिवाली आती है।
ध्वनि तेज पटाखों की रौशनी,
गलियों में फिर छा जाती है।
जब रावण के संग मेघनाथ,
और कुम्भकरण भी जलता है।
श्री राम चन्द्र के जीवन का,
तब पुनरावलोकन होता है।
करवा की एक रात को जब,
अम्बर में चांद निकलता है।
प्रियवर अपनी अर्धांगिनी को,
नई दुल्हन सा सजा देखता है।
बीते दस दिन तो फिर क्या है,
यहां जगमग जग हो जाता है।
चहुँ ओर जले दीपक, झालर,
रौशन आंगन हो जाता है।
मिष्ठान बने मां के हाथों,
तो दुगुना मजा हो जाता है।
कोई छप्पन भोग लगाता है,
कोई खील - खिलौना खाता है।
शुभ मुहूर्त के आते ही सब,
पूजन में सम्मिलित होते हैं।
गणेश-लक्ष्मी जी भक्तों के ,
घर खुशियों से भर देते हैं।
ये शीत लहर का पर्व हमें,
बहुत आनन्दित करता है।
कोई दोष न आये हे प्रभु जी,
अंकित यही प्रार्थना करता है।
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