Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Thursday, 24 March 2016

अरे भाई साहब क्या ये है पहले वाला हिन्दुस्तान।


ये है हिन्दुस्तान ,क्या ये हिन्दुस्तान
अरे भाई साहब क्या ये है पहले वाला हिन्दुस्तान।
फैशन  जैसी बदल रही है अब  इसकी पहचान।
गिरगिट जैसा रंग बदलने में लोगों की शान।
यहां विविधता में एकता की शिक्षा हुई वीरान।
भाई भाई न सिक्ख ईसाई न हिन्दू मुसलमान।
क्या है भला और क्या बुरा दिखता  एक समान।
अरे भाई साहब क्या ये  है पहले वाला हिन्दुस्तान।

देश के भीतर बैठ गये हैं कुछ ऐसे बेईमान।
बेच रहे सामान समझकर रुपयों में इंसान।
कीमत लेकर होने लगा है घर से कन्यादान।
धन्य यहां पर हर रिश्ता और रिश्तों का सम्मान।
जानकार हर शख्स यहां पर बनता है अंजान।
आपस में ही फूट डालने का चलता अभियान।
अरे भाई साहब क्या ये है अपना हिन्दुस्तान।

सुन्दर सुन्दर नगर बसाने से आखिर क्या होगा
ऐसा जीवन सफल बनाने से आखिर क्या होगा।
सत्य चीखते बोल दबाने से आखिर क्या होगा।
मिथ्या का दरबार सजाने से आखिर क्या होगा।
हम भारत के वासी हैं कहलाने से क्या होगा।
कुछ  खास दिनो पर देशभक्त बन जाने से क्या होगा।
सदा तिरंगा लहराए न घटने दो देश की शान।
सौ बार धन्य वह काया जिससे हो देश का मान।
अरे भाई साहब ये है हम सबका हिन्दुस्तान।

सही सोच से सही दिशा में ले चलना विज्ञान।
किस कारण से जन्म लिया इस बात पे देना ध्यान
हमें सिखाना है खुद को इंसानियत का ज्ञान।
क्या कहती गीता हमसे और क्या कहती है कुरान
घर बैठे न होने वाला भारत देश महान।
अरे भाई साहब ये है अपना प्यारा हिन्दुस्तान।







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