Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Saturday, 19 November 2016

धन क्रांति, सर्व शांति ( Serjical Strike on money)

क्या पक्ष, क्या विपक्ष,
सबका ही माथा ठनका।
नींद उड़ गई उन सबकी,
नोटों पर बिस्तर जिनका।

वो जाये कहाँ, ले जाये कहाँ,
कागज से बने वे टुकड़े।
चाह में जिसकी करते थे,
हर रोज दिलों के टुकड़े। 

कितनों ने भावी कल के लिए,
काला धन खूब जमाया था।
स्वर्ग से सुन्दर घर बनवाकर,
पैसों को उसमें दबाया था।

मांग बढ़ी गई, है छोटों की,
सुई ताकतवर, तलवार नही।
सौ - पचास की कीमत से, 
बढ़कर नोट 'हजार' नही।

रिश्वत लें भी, तो देगा कौन,
लेने देने का चलन गया।
जिस लाल नोट की माया थी,
उसका साया भी चला गया।

पचास दिनों का वादा कर,
मोदी ने सपना दिखाया है।
श्री गणेश कर रूपयों से,
अच्छे दिनों को बुलाया है।

भ्रष्टाचार मुक्त मुल्क हो,
इस क्रम में पहला काम किया।
कुछ भ्रष्ट विपक्षी दलों ने इसको,
साजिश जैसा एक नाम दिया।

ईमानदार हम साहूकार हम,
सब चोर ये डंका बजा रहे हैं।
जनता को हथियार बनाकर,
अब संसद में चिल्ला रहे हैं।

माना कि कुछ बेगुनाह भी,
आये तकलीफों के घेरे में।
पर सख्त कदम उठाए नही,
तो जन जीवन भी अंधेरे में।

छल का विरोध सत्यता शोध
यह क्रांति है देश बचाने की।
सम्पूर्ण विश्व में शांति पूर्ण,
भारत का मान बढ़ाने की।




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