Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Thursday, 8 June 2017

ऐ जिंदगी तुझसे इतनी सी ख्वाहिश है - - -

ये जिंदगी एक ख्वाब जो अक्सर अधूरा होता है,
नयी चाहत जाग जाती है, जब पिछला ख्वाब पूरा होता है।
हसरतों ने जिंदगी से हमेशा, कुछ न कुछ मांगा होता है।
पर समय रहते ही मिल पाना, ये बहुत मुश्किल होता है।

जो मिला है वो काफी तो नहीं,
कुछ और भी मिले यही दरकार है।
पूरा करेगी ऐ जिंदगी तू ही तो
ये जो सपनों से भरा संसार है।

ख्वाहिश है कि -
चार दिन की चौकस जिंदगी में,
ढाई अक्षर का प्यार हो,
एक हंसता खेलता परिवार हो,
जरिया हो धन कमाने का,
बस कोई ढंग का व्यापार हो।

जब चार दीवारों की साये में, दिन गुजर रहे होते हैं,
तब आरजू  होती है कि-
एक छोटा आशियाना हो,
जीवन जीने का कोई तो बहाना हो।
अपनी निकले जब कभी भी बारात,
तो ख्वाहिश है कि पीछे सारा जमाना हो।

पर इतने में भी संतोष.....!
नहीं ,चाह अभी और भी है
अभी तो कुछ मांगा नहीं,
प्रस्ताव अभी और भी हैं।

उदासीन व्यक्तिव में थोड़ी शानौ-शौकत होती।
ऐ काश मेरे हिस्से में भी जहां की दौलत होती।
काश की हर दिशाओं में मेरे नाम की चर्चा हो।
इतना बना कर दे दे जिंदगी कि आजीवन खर्चा हो।

ऐ जिंदगी तू मुझे सब दे जो खुदा मेरी किस्मत में लिख चुका।
और वो भी दे जिसको अभी तक हांसिल न कर सका।
ख्वाहिश हसरतें इच्छाओं कि फरमाईस है
मिल जाये वो सब, जिसकी गुंजाईश है।

जिंदगी तुझसे ख्वाहिश है तू मुझे कुछ तो बना दे।
इंसान के काम आंऊ  पहले वो इंसान बना दे।

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