Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Tuesday, 15 August 2017

'स्वतंत्रता' भारत का एक अध्याय


नमन कर मातु भारत को, तिरंगा ध्वज मैं फहराऊं।
करूँ वंदन हे जग जननी, फसाने वीरों के गाऊं।
कहलाता था ये अपना देश, कभी चिडि़या एक सोने की।
कहां उड गई, मेरे यारों कमी है उसके खोने की।



फिरंगी देश में जब आये, बहाने लाखों थे लाये।
किया व्यापार भारत में, ये सालों कहर थे ढाये।
रहे जिस देश के भीतर, अन्न-जल जहां का खाया।
उस सुन्दर भारत में अंग्रेजों ने, कब्जा था जमाया।




गुलामी की जंजीरों में, आम जनता बिलखती थी।
गोरों के दिये हर जुल्म को, चुप रह के सहती थी।
होंगे आजाद कब इनसे , यही हर दिल में चाहत थी। 
दुर्दशा देख भारत की, बापू की रूह आहत थी।





भगत, आजाद जैसे वीरों ने, विद्रोह की ज्वाला भड़काई।
आंदोलन चले, प्राणों की आहुति, तब कहीं आजादी पाई।
जब भारत के वीर सपूतों ने, इस मिट्टी का कर्ज चुकाया था।
तब 1947 में 15 अगस्त को, आजादी का जश्न मनाया था।








हर साल इसी दिन हर दिल में, धड़कन में तिरंगा रहता है।
बच्चा - बच्चा भी भारत का, भारत मां की जय कहता है।
समय बदला, बदलाव हुए, पर कुछ तो कमी अभी बाकी है।
उस सोने की चिड़िया वाले, भारत की अधूरी झांकी है।







उम्मीद हर एक भारतवासी की, सफल इसे सरकार करे।
हर हिन्दुस्तानी के सपनों को, श्री मोदी जी साकार करें।






















No comments: