कि जिसकी खोज में निगाहों ने न विश्राम किया।
उसे न पाकर लगाता है कि गलत काम किया।।
लाखों कोशिशों का दर किनारा करके वो जालिम।
उसने मेरी मोहब्बत में ही मुझे नाकाम किया।।
नही शिकवा न शिकायत हमें अब उससे रही,
बस एक सवाल मेरे जहन में चुभता है कहीं।
ऐ हवा तुझे ही मिल जाये वो तो जरा पूछ लेना,
उसने मेरी मोहब्बत का तमाशा क्यूँ सरेआम किया।
No comments:
Post a Comment