Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Monday, 16 October 2017

जख्म

कि जिसकी खोज में निगाहों ने न विश्राम किया।
उसे न पाकर लगाता है कि गलत काम किया।।
लाखों कोशिशों का दर किनारा करके वो जालिम।
उसने मेरी मोहब्बत में ही मुझे नाकाम किया।।

नही शिकवा न शिकायत हमें अब उससे रही,
बस एक सवाल मेरे जहन में चुभता है कहीं।
ऐ हवा तुझे ही मिल जाये वो  तो जरा पूछ लेना,
उसने मेरी मोहब्बत का तमाशा क्यूँ सरेआम किया।

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