Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Tuesday, 19 September 2017

अनसुलझी गुत्थी

कौन है, किसने कहा, किससे सुना ये जान कर,
फिर किसी परिणाम का अनुमान होना चाहिए।


भीड़ में भटके, भटकते- दूर हो कर चल पड़े,
तो मिल रही राहों से भी पहचान होना चाहिए।


कायदे से हम, हमारे खुद के सबकुछ हो लिये हैं,
पर कभी तो साथ कोई, मेहमान होना चाहिए।


जंग में बारूद, गोला, हाथ हथियारों सहित
युद्ध की हर नीति का, सम्मान होना चाहिए।


काटने की चाह गर, दिल में नही बबूल की,
तो बीज को बोते समय भी आम होना चाहिए।


जो गिर गया हद तक, मुझे अक्सर गिराने में,
हौसला हमारा देख, वो परेशान होना चाहिए।


कुछ न रहे, तो भी बहुत, आखिरी सांसो के चलते
साथ में खुद के सदा  ईमान होना चाहिए।

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