Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Monday, 23 October 2017

एक निमंत्रण ऐसा भी (an invitation)



अरे सर्दी,  
तू क्या रूठी हुई है, कहां है, 
अभी तक आई यहां क्यूँ नहीं।

ठंडी हवायें जो सहेली हैं तेरी। 
क्या उनसे तुम्हारी मुलाकात हुई नहीं।




क्या तुम्हे तकलीफ है, कुछ तो बता दो 
मौसम चक्र को भूलकर यूं न सजा दो।

दिन की धूप बदन पर पसीना बहा देती।
ये दशा देख कर भी तू सुध क्यूँ नहीं लेती।         



तुम्हारा इंतजार सभी फसलें कर रही हैं। 
ओस बूंदों की कमी से वो आहें भर रही हैं।
  
अब आ भी जाओ ठंडक तुम्हें  रजाई बुला रही। 
तेरी ना मौजूदगी में पंखा-एसी की हवा सुला रही।




तुम्हारे बिना ऐ सर्दी भोजन का मजा फीका है। 
कीट-मच्छरों के आतंक से हर शख्स चीखा है।

सब्र अभी कितने दिन का तुम्हे जल्द ही आना होगा। 
हर बार की तरह इस बार भी अपना जलवा दिखाना होगा।

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