Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Sunday, 29 October 2017

समन्दर के बीच प्यासा

बंद कर आंखों को वो
         खुद को तसल्ली देते हैं,
कि आसपास जो भी है
         उनके वो बेहतर है,

कभी खोलकर आंखें
         निहार लो जो वहीं तो,
तुम्हे दिख जायेगा कि
         हालात उधर कैसा है।

जिसने बस दूसरों के
        घर की ही गंदगी देखी,
उसे मालूम क्या
      नजदीक खुद के क्या क्या है

नजरिया ही नही सही तो
        नजर क्या करे खुद से
चांद में सिर्फ दाग देखने
        कि ही क्यूँ अभिलाषा है।

मिल रही नदियों से जिसने
      किनारा रखा अक्सर,
वो समन्दर के बीच
      जाकर रह जाता प्यासा है।

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