Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Sunday, 25 February 2018

' वो ' - मेरे हैं या नहीं



खुश हैं कि कुछ हवाओं का साथ ऐसा भी है, 
जो साथ हैं मेरे , ये एहसास तो दिलाती हैं।

अफसोस मगर इस रूह को बस इतना है,
कि भरी धूप की गर्मी में, वो किधर जाती हैं।



भीड़ मेले सी आस - पास हुआ करती है,
गर न चाहो भी तो, शोर किया करती है।  

अपनाओ जो तो ऐसे, जैसे जड़ को मिट्टी,
वरना वो धूल है जो, पत्तों पर लगा करती है।



प्यार और हमदर्दी के मायने बदलते ही, 
कभी- कभी खुद के उसूल भी फिजूल हो जाते हैं।

जो बोलते थे, मुश्किल है  एक पल भी बगैर  तेरे , 
उन्हे देखा है  बेपरवाह, क्या खूब जिये जाते हैं।  

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