Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Sunday, 25 February 2018

इस पल को... क्या नाम दूं ।


विडम्बना है कि, 
ये ह्रदय की गहराइयों से निकले जज्बात है। 

वास्तविकता बयां करती
वास्तव में ये उन दिनों की बात है।

वो दिन जब हम चले थे,
किसी महफूज़ जगह की तलाश में। 

साथ मेरे वो अकेली,
केवल परछाई ही थी पास में।

मैं,

     मैं चलता जा रहा था,
कुछ सोंचता जा रहा था। 
कुछ मिलते जा रहे थे,
तो कोई छूटता जा रहा था।

मैं हैरान था क्या सफर ऐसा होता है,
कभी भी, कुछ भी अचानक होता है। 

मुझे भीड़ में नये चेहरों का दीदार हो रहा था,
हर शख्स के मिलते हर पल,
हर लम्हा त्योहार हो रहा था।

सच कहता हूँ -
उस वक्त जो दिल को छू लेता
वो आज का बेहद खूबसूरत गाना बन गया। 

चंद लफ्जों की डोरी में पिरोया
असल जिंदगी का  तराना बन गया।।


No comments: