पसंद वो ,
शायद जिसके लिए जिद करता था,
पिता जी से कि ,
ये नया बस्ता दिलवा दीजिए या,
वो अलग सी दिखने वाली पानी की बोतल ,
जिससे पानी पीना था वो है मुझे पसंद
स्कूल में दोस्तों के बीच डिजाइन वाली पेंसिले और कलम थी पसंद ,
कहीं मेले में गया तो , पसंद आ जाने वाली वो कुछ छोटी मोटी चीजें जैसे ,
उड़ते गैस के गुब्बारे, खिलौने, या फिर घर पर सजा के रखने के लिए गुलदस्ते ,
जिद से कभी तो कभी प्यार से ले ही लेता था ,
पिता जी से ।
क्या नहीं था मुझे पसंद ,
किसे कहूं वो जो बचपन में मां के साथ रास्ते में जाते दिख जाती कोई भी वस्तु,
जो अपनी ओर मुझे आकर्षित करती थी ,
हां वो सब भी तो था न मुझे पसन्द ?
ना जानें क्या क्या पसंद आ जाता था , कुछभी ,
कभी भी ,
कही भी घर के भीतर या घर से बाहर ,
पसंद का क्या कुछ भी पसंद था,
जो नही दिखता था मेरे पास ,
हर वो चीज पाने की इच्छा ।
और कहने के लिए एक ही बात , ये पसंद है मुझे दिला दीजिए ना!
दिन बीतते गए अपनी पसन्द की चीजों को लेते लेते ,
बचपन भी बीत गया ,पसन्द बदलती गई ,
कुछ नया मिलता गया तो , जो था पसंद वो अब शायद नापसंद ।
जो शोर पसंद था,
तो अब खामोशी पसंद है ,
जो चंचलता पसंद थी,
तो अब गंभीरता पसंद है ,
पहले दौड़ते कूदते रहना पसंद था ,
अब संभल के चलना पसंद ।
जिन चीजों के लिए कभी पैसे खर्च कराते थे सबके,
आज ये सब बेकार की चीज़े हैं ,
कहके अपने पैसों को बचाना है पसंद ।
सच कहूं तो पसंद तो अब भी बहुत कुछ है ,
पर अपने पैसों से सिर्फ, जरूरतें पूरी करना ही रह गया पसंद ।
और ये पसंद भी बदलेगी ,
जब खूब पैसा कमाना होगा पसंद ।
और फिर उन पैसों से जिंदगी में शौक से जीना होगा पसंद।
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