Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Friday, 5 June 2015

शायर हो गये.....





जानकर अंजान यूं क्यों हो गये,
या वक्त की आगोश में वो सो गये,
कुछ तो ऐसा है मैं जिससे बेखबर
वो न जानू किस गली में खो गये ।


  हर एक वो लम्हा याद आता है मुझे,
किस कदर हम याद आते थे तुझे,
तकलीफ ऐसी कौन सी तुझको हुई
जिसके खातिर हम जुदा यूँ हो गये।

खुशनुमा जीवन था तेरे साथ में,
सुख दुख को बांटते थे मुलाकात में,
तन्हाईयां ये इस कदर बड़ती गईं
कि इस जहाँ में हम अकेले हो गये ।

दिन गुजारे अब गुजरता ही नहीं,
आश है मिल जाय शायद वो कहीं,
स्वप्न में दीदार उनका कर सकें
बस इसी उम्मीद में हम सो गये।

संयोग हुआ बेहतर या मेरी है खता,
जाते ही उनके मिल गई है अस्मिता,
दिल टूटते ही शब्द अब जुड़ने लगे
अल्फाज खुद के शायराना हो गये ।

चर्चा है यारों, हम भी शायर हो गये...
चर्चा है यारों, हम भी शायर हो गये...

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