Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Friday, 12 June 2015

.. पुकार अन्तर्मन की ..


अपनी  कोशिश के हर पहलू पर खरा आऊंगा हरदम,
बस इक तेरे ही अल्फाज़ो को  गुनगुनाऊगा  हरदम,
मेरे वजूद ने यूं तो इतनी सी ही ख्वाहिश की है मुझसे,
वक्त रहते ही हर  एक हद से गुजर जाऊंगा हरदम |

उम्मीद बन गई है हर एक शख्स की मुझसे,
अरमानो की ऊंचाई मानो  कह  रही मुझसे,
खुद  को ले तू  संवार  अपने  कर्म वचन से, 
विस्तृत हो यश का गान यही आश है मुझसे |


ये संघर्ष रूपी  लहरें जीवन नौका का विहार,
सीमा अनंत है, न  जाने  कब  ये  होगी  पार,
इस डूब रही नाव की बस इतनी सी है पुकार,
लगाओ जोर बाजू का करो इसको भंवर के पार |

     लग रहे  रंगीन  मेरी  बगिया  में फूल बहुत हैं, 
    या कलियों  के  संग रह रहे अब  शूल बहुत हैं,
          सम्भलना राह में है अब कहीं मंजिल न खो जाये, 
       हर दिशा में हवाऐं भी खुद के प्रतिकूल बहुत हैं |


नही  मालूम  होता  है  कि क्या बनाना  जरूरी है,
बिना पहचान के  शायद जिन्दगी  भी अधूरी  है,
वक्त ये अब नही बीते लक्ष्य हासिल हो जायेगा,
निकट मंजिल है नजरों के न कोई भी मजबूरी है |






1 comment:

कल said...

भाव दिल को छूते हैं।