Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Wednesday, 17 June 2015

इस राह के हम भी मुसाफिर

 "मंज़िल की दिशा का निर्धारण, राह पर रखा पहला कदम तय करता है" - अंकित जायसवाल 

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आपस में  बढ़ती रंजिशो से, 
वक्त की इन बंदिशों से, 
लड़ते रहे गुमनाम काफिर। 
इस राह के हम भी मुसाफिर।।

चल पड़े हैं ये कदम, आज उठकर के सवेरे।
है मिटाना स्वयं को ही, जिन्दगी के ये अंधेरे।
अज्ञानता का ये तिमिर, अब नही बर्दाश्त है।
एक आशा की किरण, इस जिगर में व्याप्त है।
हम ढूंढ लेगें जल्द ही,
कोई खुशी अपनो के खातिर।
इस राह के हम भी मुसाफिर।।
इस राह के हम भी मुसाफिर ।।

ये दौड़ है, या खेल है, जीवन तो मानो रेल है।
पहुंचे जहां सब शौक से, ये वो मनोरम जेल है।
कश्मकश में भूल बैठे,  ह्रदय के हर  भाव को।
चूमा कभी करते थे, इन अधरों से मां के पांव को।
क्यों फायदे की चाह में,
हर शख्स अब हो गया शातिर।
इस राह के हम भी मुसाफिर ।।
इस राह के हम भी मुसाफिर ।।

आइना कोई भी अक्सर, मिथ्या दिखलाता नही।
सत्य को पहचानना, फिर क्यों हमे आता नही।
अड़चनें इस भीड़ में , पथ भ्रमित कर हँस रही।
उलझनों के चक्रव्यूह में, जिन्दगी ये फंस रही।
जो रोकते बढ़ते कदम को,
वो हमारे हैं क्या आखिर।
इस राह के हम भी मुसाफिर ।।
इस राह के हम भी मुसाफिर ।।         

1 comment:

Ek Kavita aisi bhi said...

मित्रों कविता को पढ़ने के उपरान्त अपने अमूल्य विचार अवश्य व्यक्त करें।