Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Monday, 15 June 2015

ऐ काश तरक्की हो जाये

खुदा ढूंढने निकला जब सड़कों को खुदा बहुत पाया,
देख दशा गलियारों की मन भीतर से है घबराया, 
बनते ही सड़क उखड़ती है हर गली में बहता नाला है,
लगता है इसमें लोगों ने कर दिया खूब घोटाला  है,
खुद की जेबें भरने वालों से आवाम का हित भी हो जाये,
मिल जाये मुक्ति कीचड़ से सड़के सब पक्की हो जाये,
ऐ काश तरक्की हो जाये , ऐ काश तरक्की हो जाये।

इस भ्रष्ट व्यवस्था से पर्दा झट से उस दिन उठ जाता है,
जिस दिन दौरा करने कोई आला अधिकारी आता है,
मंत्री जी के आते ही हर वह मार्ग दुरुस्त हो जाता है,
जिसकी खातिर आम आदमी वर्षों तक चिल्लाता है,
काम हो चलना ऐसे ही  तो हर रोज़ कोई अफसर आये,
इस भोली-भाली जनता के जीवन में भी कुछ सुख आये,
ऐ काश तरक्की हो जाये, ऐ काश तरक्की हो जाये।

हर गांव शहर का किस्सा है न कोई भी हिस्सा छूटा है
आखिर रखवालों ने ही क्यों अपने इस घर को लूटा है
घना अंधेरा छाया है कोई राह नजर में न आये,
खुदा मेहर कर भारत पर ऐ काश तरक्की हो जाये,

आम आदमी की पुकार संसद तक काश पहुंच जाये,
मिट जाये भ्रष्टता भारत की चंहु ओर अमीरी छा जाये,
सोने का बहाना करने वालों की आंखे जब खुद खुल जाये,
दावा  करता  है  ये  'अंकित'  तब देश तरक्की कर जाये।
ये देश तरक्की कर जाये,  ये देश तरक्की कर जाये।

1 comment:

Rubi said...

Very nice