Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Sunday, 21 June 2015

.. पिता जी..

इस दुनिया में रोते हुए, जब नन्हा सा चेहरा आया।
मुस्कुराते हुए उन्होंने, उसे सीने से लगाया।

जब मैं  चल  न सकता था तो, उंगली पकड़ के चलाया।
घोड़ा बनकर उन्होंने ही, हमे आंगन में घुमाया।

अलग- अलग नामों से, घर में सभी ने बुलाया।
पर पापा की नजरों में, राजा बेटा ही कहलाया।

अच्छे - बुरे का ज्ञान, हमे  उनसे ही समझ आया।
कठिनाइयों से लड़ना, हमे  उन्होंने  सिखाया।

जीवन के संघर्ष पथ पर, मैं जब कभी घबराया। 
तब पापा की बातों ने ही, मेरा हौसला बढ़ाया। 

मनुष्य का अवतार तो,  माँ  के  जरिए  पाया।
पर इंसान बनने का जज्बा, पापा ने ही जगाया।

अन्त में दोस्तों मुझे, बस इतना ही  समझ आया
जन्म मां ने दिया,
किन्तु जीने का सलीका, पिता जी ने ही बताया।






1 comment:

Ek Kavita aisi bhi said...

ये कविता मेरी ओर से दुनिया के प्रत्येक पिता को समर्पित है। मैं उनके कुशल जीवन की कामना करता हूँ।
पापा जी के लिये - I love u so much.