हां वो शुरुआती असाढ़ की दोपहर,
मैंने एकान्त मन से,
कविता लिखने के लिये कलम उठाई।
मैंने एकान्त मन से,
कविता लिखने के लिये कलम उठाई।
कोरे कागज पर शीर्षक डालने ही वाला था,
कि एक बड़ी बूंद पानी की,
कलम की नोक को छूते हुए कागज पर आई।
कि एक बड़ी बूंद पानी की,
कलम की नोक को छूते हुए कागज पर आई।
ये वर्षा के जल की नही,
उस नमकीन पानी की थी,
जो मेरे बदन से बह रहा था।
उस वक्त कमरे की दीवारें,
मानो भट्ठी की आन्तरिक सतह
और मैं, नान के जैसे सिक रहा था।
उस नमकीन पानी की थी,
जो मेरे बदन से बह रहा था।
उस वक्त कमरे की दीवारें,
मानो भट्ठी की आन्तरिक सतह
और मैं, नान के जैसे सिक रहा था।
तभी ख्याल आया कि,
इस कविता में गर्मी का वर्णन करूं।
जिसमें घर - बाहर के मौसम का,
वर्तमान रुप - रंग भरूं।
जेठ माह से सूरज अपना, पूरा भौकाल दिखा रहा।
कड़ी धूप के कहर से, धरती पर हर कोई बौखला रहा।
कड़ी धूप के कहर से, धरती पर हर कोई बौखला रहा।
कोई बैठे - बैठे पंखा, एoसी, कूलर की हवा खाता है।
कोई पानी, पना, कुल्फी, लस्सी, सोडा से मन बहलाता है।
कोई पानी, पना, कुल्फी, लस्सी, सोडा से मन बहलाता है।
फ्रिज में रखी बोतल भी, क्यूँ ठंडी नही होती है।
शहर गांव हर जगह पर, बिजली की कटौती है।
शहर गांव हर जगह पर, बिजली की कटौती है।
इससे पहले कि मैं कुछ लिखता, मन हो गया उदास।
बत्ती गुल हो गई, और मुझे लगने लगी थी प्यास।
बत्ती गुल हो गई, और मुझे लगने लगी थी प्यास।
पर आज भी मै बैठा,
आसमाँ की ओर ताक रहा।
बारिश के इंतजार में,
एक एक दिन काट रहा।
बस..............................
एक - एक दिन काट रहा ......
आसमाँ की ओर ताक रहा।
बारिश के इंतजार में,
एक एक दिन काट रहा।
बस..............................
एक - एक दिन काट रहा ......

1 comment:
कविता पढने के उपरांत , कृपया अपने अमूल्य विचारों को प्रस्तुत करें ।
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