Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Monday, 22 June 2015

गर्मी का कहर, असाढ़ की दोपहर

हां वो शुरुआती असाढ़ की  दोपहर,
मैंने एकान्त मन से,
कविता लिखने के लिये कलम उठाई। 
कोरे कागज पर शीर्षक डालने ही वाला था,
कि एक बड़ी बूंद पानी की,
 कलम की नोक को छूते हुए कागज  पर आई।

ये वर्षा के जल की नही,
उस नमकीन  पानी की थी,
जो मेरे बदन से बह रहा था।
उस वक्त कमरे की दीवारें,
मानो भट्ठी की आन्तरिक सतह
और मैं, नान के जैसे सिक रहा था। 

तभी ख्याल आया कि,
 इस कविता में गर्मी का वर्णन करूं।
जिसमें घर - बाहर के  मौसम का,
 वर्तमान  रुप - रंग भरूं।

किस तरह से लोगों का, जीना हो रहा दुश्वार है
सड़कों पर दिन होते ही, रोज दहकते अंगार है

जेठ माह से सूरज अपना, पूरा भौकाल दिखा रहा।
कड़ी धूप के कहर से, धरती पर हर कोई बौखला रहा।

कोई बैठे - बैठे पंखा, एoसी, कूलर की हवा खाता है।
कोई पानी, पना, कुल्फी, लस्सी, सोडा से मन बहलाता है।

फ्रिज में रखी बोतल भी, क्यूँ ठंडी नही होती है।
शहर गांव हर जगह पर, बिजली की कटौती है।

इससे पहले कि मैं कुछ लिखता, मन हो गया उदास।
बत्ती गुल हो गई, और मुझे लगने लगी थी प्यास।

पर आज भी मै बैठा,
आसमाँ की ओर ताक रहा।
बारिश के इंतजार में,
एक एक दिन काट रहा।
बस..............................
एक - एक दिन काट रहा ......

1 comment:

Ek Kavita aisi bhi said...

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