Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Thursday, 24 December 2015

मैं और मेरा बचपन .. धुंधली तस्वीर.. (memories)

घर में टंगे आईने में,मैंने खुद को निहारा ,
उसके अंदर की तस्वीर ने ये कहकर पुकारा,
कि -
मुझे देखने के लिए तुम कितना उछलते थे,
छोटे थे,गिरते कई बार,फिर कहीं संभलते थे,
लेकिन आज तुम मेरे सामने हो अच्छे से खड़े,
शायद मैं छोटा हो गया और तुम बहुत बड़े,
इतनी सी बात पर मैं जोर से खिलखिलाया ,
एक पल के लिए मैंने मेरा बचपन  दोहराया ,
वो रोज की शरारत ,
मिट्टी की इमारत।
लकड़ी का घोड़ा,
चादर का कोड़ा।
कागजों के जहाज,
बंसी-भोंपू के साज।
हवा भरे गुब्बारे,
मीठे चांद सितारे।
शक्तिमान का आना,  
साईकल खूब चलाना।    
रिमोट वाली कार,
लूडो और व्यापार।
चोर पुलिस का खेल,
बच्चों से बनी रेल। 
लम्बी डोर की पतंग,  
मस्ती दोस्तों के संग। 
झूठ-मूठ की चाट,
बाबा जी की डाट।
दादी जी की लोरी,
चंदा और चकोरी ।
नानी की कहानी ,
एक राजा एक रानी।
विस्मृत था जो कुछ भी वो सब याद आ गया।
धुंधली तस्वीर के जैसे मेरे जहन में समा गया।





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