Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Saturday, 26 December 2015

.. इश्क, शायर और शायरी..

एक शायर को, एक से चेहरे से इश्क हो जाता है।
होकर प्यार में पागल , वो उसे ही गुनगुनाता है।

प्रेमिका ने पूछा-
तुम शायर हो, हर रोज एक नई शायरी बनाते हो।
इतना सब लिखने के लिये , ख्याल कहां से लाते हो ?
शायर बोला-
मैं तो एक छोटी सी शब्द और भाव की दुकान हूँ।
उगा दे जो हर सुख दुःख, मै ऎसा ही एक किसान हूँ।

वो बोली इतना हुनर है तुममें , मुझे भी दिखाओ।
क्यूँ न एक शायरी तुम  मुझ पर ही फरमाओ ।

सोंचा, पर कोई भी शायरी उसे समझ न आई।
काफी सूझ-बूझ से सामान्य सी बुध्दि लगाई।

मन ही मन बोला हर लड़की को, एक ही चीज मन भाई।
खुश होगी ये भी , अगर झूठी ही सही, पर मैं करुं इसी की बड़ाई।

कहने लगा ओ प्रिये...
कविता लिखूं तुम पर तो मेरी गुस्ताखी होगी ,
क्योंकि तुम्ही मेरी कविता,मेरे शब्द मेरे भाव हो।
प्रिये, हर वो शायरी अधूरी सी लगेगी,
जिसमें तुम्हारी खूबसूरती की चर्चा का अभाव हो।

तुम धूप में खिलता हुआ कमल हो,
हर दिल को छू जाये ऐसी गजल हो।
एक अर्से से ख्वाबों में जो आती शक्ल मेरे,
तुम हूबहू  उसी चेहरे  की नकल हो।

सुनते ही इतना वो भीतर से गदगद हो गई।
शायर की शायरी में हमेशा की तरह खो गई।

इसलिए कहता हूँ कि_
इश्क हो गर किसी को तो ऐसा ही हो
हर समय उनकी यादों में डूबे रहो।
दुनिया पागल भी कह दे तो क्या है बुरा,
पागलों की तरह , प्यार करते रहो।

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