Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Thursday, 24 December 2015

.. सुहाना सफर, साथ हमसफर..

ऐ मेरे दोस्त तेरी जुबां इतनी खामोश क्यूँ है।
मेरे पैगाम का मिलना महज एक संदेश क्यूँ है ।
यूं तो नजदीक मैं रहता हूँ घर के आज भी।
फिर यही एक जगह आपस में ही परदेश क्यूँ हैं।

सफर कुछ दिन का ही संग में मगर हसीन था
क्या उस विश्वास का धागा बहुत महीन था ।
यकीं तो अब भी नहीं, तेरे बदले हुए रंग पर।
हमे तो खुद से ज्यादा तुझ पर ही यकीन था।

तुमसे वो पहली मुलाकात की गई ढेर सारी बात
इंतजार में गुजरता दिन,सपनों से भरी थी रात।
तुम्हारे जाते ही खो गया है वो मुस्कुराता चेहरा।
हर घड़ी रहता था जिस पर मेरी नज़रों का पहरा ।

मै तो हर शाम घर से बाहर निकलता आज भी।
फर्क इतना है कि अब बस साथ में परछाई है।
तुम शायद भूल गए, पर मैं न भूला आज भी।
वो हर एक शाम जो हमने साथ में बिताई है।

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