Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

रचनाओं के माध्यम से साहित्य का सृजन , और समाज को नई दिशा...

Wednesday, 30 December 2015

'धक् धक् मंडल' की छुक छुक रेल

कुछ दूर से आये हैं, कुछ को कोसों दूर जाना है।
सभी जल्दी में है, उनका सुदूर कहीं ठिकाना हैं।

कोई दौड़ते हुए आया है, उसे आराम फरमाना है
जो थक गया बैठे बैठे , उसे टांगों को चलाना है।

एक के बाद एक, अनगिनत बढ़ती हैं  सवारी। 
कोई घर को जायेगा, किसी की घूमने की बारी।

हर तरह के लोग- बच्चे , बूढ़े, युवा पुरुष, नारी। 
कोई खाली हाथ , किसी के पास झोला बड़ा भारी।

कुछ खाने की चाह लिये, फूड स्टाल पर जाते हैं।
फेरी वाले  घूम- घूम कर, गर्म चाय पिलाते हैं। 

कुछ आपसी बातों में , अनावश्यक शोर मचाते हैं। 
कुछ कतारों में खड़े हैं, किसी और पर चिल्लाते हैं।

धक धक अड्डा भीतर, कई आवाजें टकराती। 
ज्यादा देर सुनो ये सब,तो खोपड़ी है चकराती।

'ध्यान दें' कहकर कोई आंटी , माईक से बताती।
आनेवाली  कहां से आई , और  कहां को जाती।

इतनी नोकझोंक में भी , सभी को सफर कराता है।
कुछ को गुजारा देता , कुछ को मंजिल पहुंचाता है।

लौहपथ पर अग्रसर इंजन , बोगियां दौड़ता  है।  
तीक्ष्ण हार्न छुक छुक ध्वनि, निरन्तर चलता जाता है।
..............  तीक्ष्ण हार्न छुक छुक ध्वनि, निरन्तर चलता जाता है।
" a original pic of  lucknow railway station which describes all over my poem "

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