Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Friday, 11 March 2016

फुरसतिया लाल का कमाल


पीला कुर्ता सफेद धोती कंधे पर गमछा डाल।
चाय नाश्ता कर के निकले फुरसतिया लाल।
जय राम दुआ सलाम हर एक जन का लेके हाल।
धुन गावत पान चबावत चलत रहे लंबी चाल।

मोहल्ले की हर खबर हर एक से पहचान।
चाहे नुक्कड़ की दुकान या फिर गली के मकान।
सम्पर्क बड़ा तगड़ा और हर विषय का ज्ञान।
ऐसे फुरसतिया लाल अपने आप में महान।

बिना सोंच कभी भी मजाल जो न सोचे।
बिना समझ बीच में साधू जन का न टोके।
वाहवाही की खातिर गप्पें लम्बी झोंके।
बैठे - बैठे पडोसी को  कोहनिया ते कोंचे।

छौंक लगे हर बात पर रस्सी का सांप बनाय।
मन मर्जी की नरिया में समन्दर देत बहाय।
गली मा खेलते बच्चन के पास जब कबहुं आय।
बिन मांगे दैदे सलाह  खोपड़ी देत पकाये।

ऐसा न कोई एक नमूना ई दर दर पाया जाय।
शहर गांव के टोला में फुरसतिया से मिल जाय।
बिना निमन्त्रण पहुंच कर आसन लेत जमाय।
मुफ्त के मेवा चाप कर सांझ ढले घर जाय।

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