साथ सहारा छूट गया, मुझसे हर कोई रूठ गया।
अपने कदमों पर चलने का, कार्यक्रम तो टूट गया।
अपने कदमों पर चलने का, कार्यक्रम तो टूट गया।
देह अंग ने मन के मुताबिक, रहने से इंकार किया।
बेबस दिल ने लाचारी का, तोहफा भी स्वीकार किया।
बेबस दिल ने लाचारी का, तोहफा भी स्वीकार किया।
धोखा होता है सुनने में, प्रति पल संशय रहता है।
कानों की बेपरवाही में, मन सहमा - सहमा रहता है।
कानों की बेपरवाही में, मन सहमा - सहमा रहता है।
बन बुत आराम किया करना, सब काम काज से दूरी है।
दिनरात एक सा लगना भी, आखिर कैसी मजबूरी है।
दिनरात एक सा लगना भी, आखिर कैसी मजबूरी है।
फैशन वाला ऐनक पहने, जो आंखें दिखती थी प्यारी।
लगता है इनके दम पर, कुछ देखना भी है भारी।
सुनी कहानी सच लगती है, सचमुच माटी सी काया।
पता नहीं इस जीवन में, ये दुःखद बुढापा क्यूँ आया।
इर्द-गिर्द सन्नाटा पसरा, बगल न कोई रहता है।
सागर से खारे जल वाला, आंसू ही बस बहता है।
मेरे कितने अपनों ने, मुझको विश्वास दिलाया था।
मेरी सारी खुशियों में, नजदीक उन्हे ही पाया था।
सन्नाटे में खाली बैठा, निज अन्तर्मन चिल्लाया था।
भीतर से वो अपना, जिसने सहसा मुझे हिलाया था।
गहरी नींद में सोया था, बेकार में ही घबराया था।
आंख खुली तो पाया कि, मुझको तो सपना आया था।
पर जो भी था वो होना है, कौन रहा इससे बाकी।
इस सपने ने दिखलाई मुझको, मर्म बुढ़ापे की झांकी।

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