Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Friday, 25 August 2017

'अच्छे दिन' एक अधूरी कल्पना..

बांध के पट्टी आंखों पर बस एक ही नारा कहते हैं।
मंहगाई पे धरना देने वाले, अब मंहगाई  सहते हैं।

शतक लगाकर लाल टमाटर, लाल कर रहा लोगों की।
स्वच्छ स्वच्छता गयी कहां? भरमार हो गई रोगों की।

आम आदमी काम को तरसे, रोजगार के लाले पड़ गए।
छोटे धंधे करने वालों की किस्मत में  ताले पड़ गए।

हर कोई जूझता नजर आ रहा दफ्तर और गलियारों में।
आम आदमी पिसता दिखता, बदल रही सरकारों में।

दिन पर दिन बढती दुर्घटनाएं, आम आदमी रोता है।
औरों को भाषण देने वाला, क्यों? अब चैन से सोता है।

परेशान दिखता किसान, महिलाओं का दर्द दिखा।
बेचैन हुआ जब अन्तर्मन, तब कलम ने ऐसा लेख लिखा।

क्या? परिवर्तन आया, जो खुशहाल करेगा जीवन को।
हाथ पे हाथ धरे रहे , तो कौन? सजाये उपवन को।

क्या? भारत की बगिया के फूल सभी मुरझा जायेंगे।
अच्छे दिन को लाने वाले, कब? अच्छे दिन लायेंगे।

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