बुलबुलों की तरह एक फूंक से बना बिगड़ा,
तब कहीं देखकर मुझको वो मुस्कुराया है।
चल रही थी जो गाड़ी अभी तक गैरों से ,
अब उसे खुद के भरोसे पे ही चलाया है।
वक्त हालात कुछ बदल गये हैं पहले से,
पर अब तन्हाई में रहना हमे भी आया है।
बहुत भागे थे हम भी भीड़ में साथी के लिए,
पर अब परछाईं संग रहना हमे भी आया है।
कभी जो आजमाते थे हमारी सादगी को,
वही कहते हैं कि बदलाव मुझमे आया है।
भले थे तब भी भले आज भी हैं वैसे ही,
बस तनिक खुद का भी ख्याल हमें आया है।
यकीनन दुआओं में रहेंगे हम सबकी,
खुद को ही दूसरों के दिल में आजमाया है।
छोड़कर कल जो गया है हमारी गलियों को
लौटकर फिर वो मिलने को वहीं आया है।
हर रोज वही जिंदगी मैं जीता हूँ,
हर अहसास हर दर्द वही पुराना है।
सुना है लोग नया रोज किया करते हैं,
पर हमे तो पुराने को ही निभाना है।
मन में मंथन हुआ शायद वो फिर सच हो जाये,
लौटकर दौर पुराने, काश जिंदगी में फिर आये।
No comments:
Post a Comment