होकर एक दूजे केे नजदीक भी ,
रह गयी दरमियाँ कुछ दूरियां ।
किसी के चांद भी वीरान हैं,
और किसी की नोक पर भी चिड़िया।
जो पिंजरा बंद कर रखो तो ,
किसी भी दर पर रखा जाये।
पर खुले पंखो से उड़ता जो,
उसे अमन और चैन ही भाये।
सफेदी लाख थी उस 'पर' ,
'पर' ये मैला शंकु बेहतर था।
जो 'पर' ले आये इस दर 'पर' ,
तो कुछ एहसास बेहतर था।
यूं तो हैं मौन ये लेकिन,
अंतर्मन जानते सब हैं।
चलूं किस राह आगे तक,
मंजिल पहचानते सब हैं।
रह गयी दरमियाँ कुछ दूरियां ।
किसी के चांद भी वीरान हैं,
और किसी की नोक पर भी चिड़िया।
जो पिंजरा बंद कर रखो तो ,
किसी भी दर पर रखा जाये।
पर खुले पंखो से उड़ता जो,
उसे अमन और चैन ही भाये।
सफेदी लाख थी उस 'पर' ,
'पर' ये मैला शंकु बेहतर था।
जो 'पर' ले आये इस दर 'पर' ,
तो कुछ एहसास बेहतर था।
यूं तो हैं मौन ये लेकिन,
अंतर्मन जानते सब हैं।
चलूं किस राह आगे तक,
मंजिल पहचानते सब हैं।

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