Ek kavita aisi  bhi...  एक कविता ऐसी भी...

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Thursday, 20 September 2018

दो पंक्षी

होकर एक दूजे केे नजदीक भी ,
         रह गयी दरमियाँ कुछ दूरियां ।
किसी के चांद भी वीरान हैं,
        और किसी की नोक पर भी चिड़िया
       
जो पिंजरा बंद कर रखो तो ,
          किसी भी दर पर रखा जाये।
पर खुले पंखो से उड़ता जो,
         उसे अमन और चैन ही भाये।
        
सफेदी लाख थी उस 'पर' ,
        'पर' ये मैला शंकु बेहतर था।
जो 'पर' ले आये इस दर 'पर' ,
        तो कुछ एहसास बेहतर था।
       
यूं तो हैं मौन ये लेकिन,
       अंतर्मन जानते सब हैं।
चलूं किस राह आगे तक,
       मंजिल पहचानते सब हैं।
      

सजीव छायाचित्र साभार 'apphotography'

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