सूरज की पहली किरण से पहले,
ठंड को दरकिनार कर,
चलती फिरती चार टांगो पर बन रही,
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।
उसकी एक चुस्की में आनन्द आ जाता है
ठंड को दरकिनार कर,
चलती फिरती चार टांगो पर बन रही,
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।
उसकी एक चुस्की में आनन्द आ जाता है
घेर कर चारों तरफ से एक देना, दो देना
हर सख्श कहता जाता है
जैसे ही भईया जी का हाथ, केतली पर आता है।
कोई बगैर शक्कर, कोई मलाई मार के, कड़क पत्ती की ,
अलग अलग तरह का आडर आता है।
कोई बिस्किट कितने दिया कह कर, छोटा ही उठाता है।
बंध मक्खन का कितना हुआ सवाल आता है।
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।
हर सख्श कहता जाता है
जैसे ही भईया जी का हाथ, केतली पर आता है।
कोई बगैर शक्कर, कोई मलाई मार के, कड़क पत्ती की ,
अलग अलग तरह का आडर आता है।
कोई बिस्किट कितने दिया कह कर, छोटा ही उठाता है।
बंध मक्खन का कितना हुआ सवाल आता है।
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।
कोई कोहरे से ढकी सुबह से खुद को मिलाने लाया।
कोई कसरत कर आया,
कोई कसरत कर आया,
कोई रजाई छोड़ आया।
कोई ब्रूनो को टहलाकर, अखबार पढने आया।
सबका सफर पूरा बस यहीं पर हो जाता है।
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।
कोई ब्रूनो को टहलाकर, अखबार पढने आया।
सबका सफर पूरा बस यहीं पर हो जाता है।
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।
कोई मोदी को समझा रहा,
कोई देश का भविष्य बता रहा,
कोई फोन पर लगे हुए अपनी वाली को मना रहा।
ठेले पर खड़े-खड़े मैटर फिक्स हो जाता है।
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।
कोई देश का भविष्य बता रहा,
कोई फोन पर लगे हुए अपनी वाली को मना रहा।
ठेले पर खड़े-खड़े मैटर फिक्स हो जाता है।
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।
यूं तो हर चुस्की के साथ एक नया सवाल आता है।
पर देश की समस्याओं का हल यहीं निकल आता है।
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।।
पर देश की समस्याओं का हल यहीं निकल आता है।
जब भईया जी की चाय में उबाल आता है।।

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