अरे ! ! ! ! ! ये क्या था .....
तुम्हे अहसास हुआ , हाँ लगा जैसे हलचल सी हुई ।
सहसा शरीर कांपने लगा, धड़कने थम सी गई ।
भागो घर से बाहर निकलो, का कोहराम छा गया ।
हर शख्स डर गया , जब भूचाल सा आ गया ।
शांत , स्थिर वस्तुएं , स्वतः ही डगमगा गई ।
नेपाल की गोद उजड़ी , लहर यूपी तक आ गई ।
हाल ए नेपाल ही जब, बद से बुरा हो गया ।
हंसता खेलता परिवार, अपनों से जुदा हो गया ।
शानदार , ऊंची इमारतें, खण्डहर में बदल गई ।
हजारों के सीने पर , बिन बन्दूक गोली चल गई ।
कहीं दफ्तर में रखी कुर्सियों ने, झूला था झुलाया ।
कहीं डर के घर का हर सदस्य, सड़कों पर उतर आया ।
ऐ मनचली धरती ,तू अंगड़ाई लेगी ,
यह खबर पहले ही,उन मासूमों को मिल जाती ।
तो शायद अगली सुबह, उनके जीवन में भी आती ।
ये मानव ने की थी गुदगुदी, जो धरती मुस्कुराई ।
गुनाह किसी और का, सजा तो सबने पाई ।
इतने ही झटके काफी थे, या कुछ और भी अवशेष है ।
क्या ये भू वासियों के लिये, भावी प्रलय का संकेत है ।
आसान नही है इस घटना के, अंजाम से उबर पाना ।
हे! धरती मां इस प्रलय को, फिर से न दोहराना ।
1 comment:
what a great reality in this poem .. very nice way of writing poems..
Post a Comment